दुनिया की राजनीति में कभी-कभी ऐसे दृश्य सामने आते हैं जो सीधे सवाल खड़े करते हैं दो दुश्मन खेमों के बीच खड़ी एक तीसरी ताकत आखिर क्या खेल रही है? जब यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की के दूत उस देश में पहुंचे जिसे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का करीबी माना जाता है, तो हलचल होना तय है. भारत और रूस की पुरानी दोस्ती जगजाहिर है, लेकिन उसी भारत में यूक्रेन के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी की मौजूदगी ने कूटनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है. यह सिर्फ एक मीटिंग नहीं थी. यह संकेत था कि जंग के बीच भी संवाद के दरवाजे बंद नहीं हुए हैं. और शायद भारत अब सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि एक संभावित मध्यस्थ की भूमिका में भी दिख रहा है.
दिल्ली में हुई यह मुलाकात कई स्तरों पर अहम है. एक तरफ युद्ध अपने चौथे साल में प्रवेश कर चुका है, दूसरी तरफ वैश्विक दबाव बढ़ता जा रहा है कि कोई समाधान निकले. ऐसे में अजीत डोभाल और रुस्तम उमेरोव की बातचीत सिर्फ औपचारिक नहीं मानी जा रही. इसमें रणनीति, सुरक्षा और शांति तीनों के संकेत छिपे हैं. भारत ने हमेशा संतुलित रुख अपनाया है. न रूस के खिलाफ खुलकर गया, न यूक्रेन से दूरी बनाई. यही वजह है कि इस ‘सीक्रेट’ मीटिंग ने दुनिया को चौंका दिया और भारत की भूमिका पर नई नजर डालने को मजबूर कर दिया.
भारत-यूक्रेन बातचीत: जंग के बीच कूटनीति का नया संकेत
- नई दिल्ली में हुई इस हाई-लेवल मीटिंग में दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ जारी युद्ध पर विस्तार से चर्चा की. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के मुताबिक यह बातचीत सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग को लेकर थी. भारत ने एक बार फिर साफ किया कि वह शांति और बातचीत के जरिए समाधान का समर्थक है, न कि सैन्य रास्ते का.
- यह मीटिंग ऐसे समय में हुई है जब रूस-यूक्रेन युद्ध लंबा खिंच चुका है और इसके असर दुनिया भर में दिख रहे हैं. ऊर्जा संकट हो या खाद्यान्न आपूर्ति, हर मोर्चे पर दबाव है. ऐसे में भारत जैसे देश का सक्रिय संवाद बनाए रखना वैश्विक राजनीति में संतुलन बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.




