मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने दो साल पूरे होने से ठीक पहले एक बड़ी सफलता हासिल की है। प्रदेश को आधिकारिक रूप से नक्सलमुक्त घोषित कर दिया गया है। केंद्र सरकार ने देश को 2026 तक नक्सलवाद से मुक्त करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन एमपी ने यह उपलब्धि समय सीमा से पहले ही हासिल कर ली।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बताया कि नक्सलवाद खत्म करना उनकी सरकार की प्राथमिकता थी। उन्होंने कहा कि राज्य में लंबे समय से सक्रिय नक्सल नेटवर्क को तोड़ने के लिए दो ही विकल्प दिए गए थे—या तो नक्सली सरेंडर करें और सरकार उनकी पुनर्वास में मदद करेगी, अन्यथा उन्हें कड़ी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। इसी नीति के तहत इस साल सुरक्षा बलों ने 10 खतरनाक नक्सलियों को मार गिराया, जबकि बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया।
प्रदेश के बालाघाट, मंडला और डिंडौरी जिले, जो वर्षों से नक्सल गतिविधियों से प्रभावित थे, अब पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं। सीएम ने यह भी याद दिलाया कि 1999 में कांग्रेस शासनकाल में मंत्री लखीराम कावरे की नक्सलियों द्वारा हत्या कर दी गई थी, जो उस समय नक्सल समस्या की गंभीरता को दिखाती थी।
भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए सीएम ने कहा कि 2026 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा गया है। उत्पादन लागत कम करने, सिंचाई का दायरा बढ़ाने और कृषि सुधारों के ज़रिए यह लक्ष्य हासिल किया जाएगा।
सिंहस्थ कुंभ 2028 पर अपनी दृष्टि साझा करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि भारतीय आध्यात्मिकता, संस्कृति, योग और वैदिक ज्ञान को विश्व स्तर पर दिखाने का अवसर होगा।
बालाघाट में बचे आखिरी दो नक्सल कैडरों — दीपक उइके और रोहित — के सरेंडर करने के बाद मध्य प्रदेश को पूरी तरह नक्सल खतरे से मुक्त घोषित किया गया। सिर्फ 42 दिनों में एमपी, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ ज़ोन से 42 माओवादी सरेंडर कर चुके हैं, जो इस अभियान की बड़ी सफलता को दर्शाता है।





