छत्तीसगढ़

प्रार्थना शेड में पढ़ने को मजबूर मासूम: आखिर कब मिलेगा घोरतलाब के बच्चों को अपना स्कूल भवन

(अकील मेमन)

छुरिया। खुज्जी विधानसभा के ग्राम घोरतलाब में शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल, बच्चों का भविष्य भगवान भरोसे .एक ओर प्रदेश सरकार “सुशासन”, “गुणवत्तापूर्ण शिक्षा” और “हर बच्चे तक शिक्षा” के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर राजनांदगांव जिले की खुज्जी विधानसभा के अंतर्गत छुरिया विकासखंड के ग्राम पंचायत घोरतलाब की तस्वीर इन दावों की हकीकत बयां कर रही है। यहां शासकीय माध्यमिक विद्यालय का भवन नहीं होने के कारण मासूम छात्र-छात्राएं खुले प्रार्थना शेड के नीचे बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं।

यह दृश्य केवल एक विद्यालय की बदहाली नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है जो शिक्षा को विकास की पहली सीढ़ी बताती है। सवाल यह है कि जब बच्चों के सिर पर मजबूत स्कूल भवन तक उपलब्ध नहीं है, तब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का सपना आखिर कैसे पूरा होगा?

सुबह जब बच्चे स्कूल पहुंचते हैं तो उनके हाथों में किताबें जरूर होती हैं, लेकिन पढ़ने के लिए सुरक्षित और व्यवस्थित कक्षाएं नहीं। तेज धूप हो, बारिश हो या ठंडी हवाएं—हर मौसम में उन्हें उसी प्रार्थना शेड के नीचे बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है। बरसात में पढ़ाई बाधित होती है, गर्मियों में भीषण गर्मी बच्चों का ध्यान भटका देती है और सर्दियों में खुले वातावरण में बैठना उनकी सेहत के लिए भी जोखिम बन जाता है।

सबसे दुखद पहलू यह है कि जिन नन्हे कंधों पर देश का भविष्य टिका है, वही बच्चे आज मूलभूत शैक्षणिक सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। शिक्षा का अधिकार कानून प्रत्येक बच्चे को सुरक्षित और सुविधायुक्त विद्यालय उपलब्ध कराने की बात करता है, लेकिन घोरतलाब में यह अधिकार केवल कागजों तक सीमित दिखाई देता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि स्कूल भवन की मांग वर्षों से की जा रही है। अनेक बार आवेदन दिए गए, जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के समक्ष समस्या रखी गई, लेकिन हर बार केवल आश्वासन मिला। नतीजा यह है कि वर्षों बीत जाने के बाद भी बच्चे उसी प्रार्थना शेड में शिक्षा ग्रहण करने को विवश हैं।

क्षेत्रीय राजनीतिक सूत्रों की मानें तो सत्ता पक्ष के कई स्थानीय कार्यकर्ता और नेता भी इस स्थिति से असंतुष्ट हैं। उनका कहना है कि वे लगातार मंत्री, सांसद और विधायक तक समस्याएं पहुंचाते हैं, आवेदन भी सौंपते हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में न तो स्वीकृति मिलती है और न ही कोई ठोस कार्रवाई होती है। इससे स्थानीय स्तर पर भी निराशा का माहौल है।

विडंबना यह है कि करोड़ों रुपये के विकास कार्यों के दावे किए जाते हैं, मंचों से शिक्षा सुधार की बातें होती हैं, योजनाओं का प्रचार होता है, लेकिन जब वास्तविक जरूरत वाले गांवों की ओर देखा जाता है तो वहां के बच्चे आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। यदि किसी गांव के बच्चों को कक्षा-कक्ष तक न मिल सके, तो विकास के सभी दावे खोखले प्रतीत होते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि विद्यालय का भवन केवल चार दीवारें नहीं होता, बल्कि वह बच्चों के सुरक्षित, सम्मानजनक और बेहतर भविष्य की आधारशिला होता है। बिना पर्याप्त कक्षाओं और आवश्यक सुविधाओं के शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है। इससे बच्चों का मनोबल भी टूटता है और उनकी पढ़ाई पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग, जनप्रतिनिधि और राज्य सरकार इस गंभीर समस्या को प्राथमिकता से लें। घोरतलाब के विद्यालय का तत्काल निरीक्षण कराया जाए, नए स्कूल भवन की प्रशासनिक स्वीकृति शीघ्र प्रदान की जाए तथा निर्माण कार्य समयबद्ध तरीके से शुरू कराया जाए। बच्चों का भविष्य राजनीतिक घोषणाओं और फाइलों में नहीं, बल्कि मजबूत विद्यालय भवनों और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में सुरक्षित होगा।

यह केवल घोरतलाब के बच्चों का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। यदि आज इन मासूमों को सुरक्षित विद्यालय नहीं मिला, तो आने वाली पीढ़ियां हमसे यह सवाल अवश्य पूछेंगी कि जब उनके भविष्य को बचाने का समय था, तब जिम्मेदार लोग आखिर कहां थे?

अब देखना यह है कि जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग, स्थानीय विधायक, सांसद और प्रदेश सरकार इस खबर को गंभीरता से लेते हैं या फिर घोरतलाब के बच्चे आने वाले वर्षों तक भी खुले प्रार्थना शेड के नीचे बैठकर अपने सपनों को साकार करने की कोशिश करते रहेंगे।

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