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7 शहर, 8 डेटा सेंटर… ग्लोबल मैप पर 6 महीने में अचानक उभरा भारत, पैसा लेकर टूट पड़े दुनिया के दिग्गज

भारत और जापान के बीच टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में साझेदारी को लेकर गुरुवार को कई समझौते किए गए. इन्हीं में से एक समझौता भारत में डेटा सेंटर लगाने से जुड़ा हुआ है. लेकिन यह पहली बार नहीं है जब किसी ने भारत के साथ ऐसा कुछ करने में दिलचस्पी दिखाई है. इससे पहले भी दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां यहां डेटा सेंटर्स लगाने में या तो रूचि दिखा चुकी हैं या फिर उन पर काम शुरू हो चुका है. भारत पिछले 6 महीने में इन सेंटर्स का सेंटर पॉइंट बनकर उभरा है. यह कहना गलत नहीं होगा कि हिन्दुस्तान दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों के लिए डेटा सेंटर का नया ठिकाना बन गया है.
गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन, मेटा, एनटीटी डेटा, रिलायंस, अदानी और कई दूसरी कंपनियां भारत में अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं. सिर्फ छह महीनों के भीतर देश के कम से कम सात बड़े शहर मेगा डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स का केंद्र बन चुके हैं. इसे अब सिर्फ निवेश नहीं बल्कि “जियो डेटा पॉलिटिक्स” का नया दौर कहा जा रहा है.

कुछ साल पहले तक तेल, गैस और बंदरगाह किसी भी देश की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत माने जाते थे. अब उनकी जगह डेटा ने ले ली है. एआई मॉडल जितना ज्यादा डेटा प्रोसेस करेंगे, उतने ही बेहतर बनेंगे. यही वजह है कि दुनिया की हर बड़ी टेक कंपनी ऐसे देशों की तलाश में है जहां बड़े पैमाने पर डेटा स्टोर और प्रोसेस किया जा सके. यहीं से जियो डेटा पॉलिटिक्स की शुरुआत होती है. इसका मतलब है कि अब देशों के बीच प्रतिस्पर्धा सिर्फ जमीन या समुद्री रास्तों की नहीं बल्कि डेटा पर भी होगी. जिस देश के पास ज्यादा डेटा, ज्यादा कंप्यूटिंग पावर और ज्यादा डेटा सेंटर होंगे, वही भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था पर सबसे ज्यादा असर डालेगा.

भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट यूजर बेस है. करोड़ों लोग हर दिन यूपीआई, सोशल मीडिया, ई कॉमर्स, वीडियो स्ट्रीमिंग और डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं. इससे हर सेकंड भारी मात्रा में डेटा तैयार होता है, जिसकी जरूरत एआई कंपनियों को सबसे ज्यादा होती है.
दूसरी बड़ी वजह डेटा लोकलाइजेशन है. भारत के नियम लगातार इस दिशा में बढ़ रहे हैं कि भारतीय नागरिकों का संवेदनशील डेटा देश के भीतर ही रखा जाए. इसका मतलब है कि विदेशी कंपनियों को भारत में ही डेटा सेंटर बनाने होंगे.
इसके अलावा भारत में जमीन और निर्माण लागत अमेरिका और यूरोप के मुकाबले काफी कम है. सौर और पवन ऊर्जा तेजी से बढ़ रही है, जिससे डेटा सेंटर को ग्रीन बिजली मिल सकती है. मुंबई, चेन्नई और विशाखापत्तनम जैसे शहरों में अंतरराष्ट्रीय समुद्री इंटरनेट केबल सीधे पहुंचती हैं, जिससे दुनिया भर के नेटवर्क से तेज कनेक्टिविटी मिलती है.

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