छत्तीसगढ़

डॉ. रमन सिंह की तस्वीर वाला पट्टा, अधिकारों से अब भी वंचित पट्टाधारक

*पट्टे में स्वामित्व, क्रय-विक्रय, हस्तांतरण और सीमांकन का स्पष्ट अधिकार, फिर भी बी-1, खसरा और पृथक नक्शा आज तक नहीं।*
*आठ वर्षों से तहसीलों के चक्कर, राजस्व व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल।*

*(अकील मेमन)*

राजनांदगांव/छुरिया। राजनांदगांव जिले के छुरिया नगर में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल में गरीब एवं वर्षों से आबादी भूमि पर निवासरत परिवारों को वितरित किए गए “मुख्यमंत्री आबादी पट्टे” आज स्वयं राजस्व व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहे हैं। पत्रकार के पास उपलब्ध मुख्यमंत्री आबादी पट्टे की मूल प्रति में तत्कालीन जिला कलेक्टर के हस्ताक्षर, भूमि का खसरा नंबर, क्षेत्रफल, चारों सीमाएं तथा शासन द्वारा प्रदत्त अधिकार स्पष्ट रूप से अंकित हैं। यही नहीं, इसी प्रकार के मुख्यमंत्री आबादी पट्टों का वितरण केवल राजनांदगांव जिले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में हजारों पात्र परिवारों को ऐसे पट्टे प्रदान किए गए।
* शासन का स्पष्ट आदेश, फिर राजस्व विभाग की उदासीनता क्यों?*
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि शासन द्वारा जारी इस पट्टे में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि यह स्थायी स्वामित्व सिद्ध करने वाला दस्तावेज होगा, हस्तांतरणीय होगा, भूमि का सीमांकन कराया जा सकेगा, क्रय-विक्रय किया जा सकेगा, तथा बिजली, पेयजल एवं अन्य शासकीय सुविधाओं के लिए इसे स्वामित्व के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाएगा।
जब शासन स्वयं पट्टाधारकों को भूमि स्वामी जैसे अधिकार प्रदान कर चुका है, तब सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2018 से लेकर 2026 तक आठ वर्ष बीत जाने के बाद भी इन पट्टाधारकों के नाम से पृथक बी-1 क्यों तैयार नहीं हुआ? उनके नाम से अलग खसरा क्यों दर्ज नहीं किया गया? उनकी भूमि का पृथक नक्शा और नजरी नक्शा आज तक क्यों उपलब्ध नहीं कराया गया? यदि शासन का आदेश स्पष्ट है तो राजस्व रिकॉर्ड आज तक दुरुस्त क्यों नहीं किए गए?
* तहसीलों में भटक रहे पट्टाधारक, बिचौलियों की चांदी?*
हजारों पट्टाधारकों का कहना है कि वे आज भी तहसील, पटवारी और राजस्व कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। कई मामलों में उन्हें यह कहकर वापस लौटा दिया जाता है कि इस पट्टे के आधार पर आवश्यक राजस्व अभिलेख उपलब्ध नहीं कराए जा सकते। पट्टाधारकों का यह भी आरोप है कि इसी स्थिति का लाभ उठाकर कुछ राजस्व कर्मचारियों एवं बिचौलियों की मिलीभगत से “काम करवा देंगे”, “दस्तावेज बनवा देंगे” कहकर मोटी रकम की मांग की जाती है। यदि इन शिकायतों में सच्चाई है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि राजस्व व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न खड़ा करती है। जिला प्रशासन को इन शिकायतों की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करनी चाहिए।
* जिलाधीश आखिर मौन क्यों?*
यह प्रश्न सीधे राजनांदगांव के जिलाधीश और संपूर्ण राजस्व प्रशासन से है। जिस जिले में तत्कालीन जिला कलेक्टर के हस्ताक्षर से मुख्यमंत्री आबादी पट्टे जारी हुए, क्या वर्तमान जिला प्रशासन का यह दायित्व नहीं बनता कि वह जिले के सभी पात्र पट्टाधारकों के नाम से पृथक बी-1, खसरा, नक्शा एवं नजरी नक्शा तैयार कराने के लिए विशेष अभियान चलाए? यदि वर्षों से हजारों लोग एक ही समस्या से जूझ रहे हैं, तो जिला प्रशासन ने अब तक इसका स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाला? क्या जिलाधीश इस विषय को प्राथमिकता देकर समयबद्ध कार्ययोजना जारी करेंगे, या फिर गरीब पट्टाधारक इसी तरह वर्षों तक भटकते रहेंगे?
* डॉ. रमन सिंह के नाम से जारी पट्टा, अधिकारों का इंतजार कब तक?*
इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि जिस मुख्यमंत्री आबादी पट्टे पर तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का चित्र अंकित है, आज वही डॉ. रमन सिंह राजनांदगांव के विधायक एवं छत्तीसगढ़ विधानसभा के अध्यक्ष हैं। जनता के बीच यह स्वाभाविक अपेक्षा है कि वे इस विषय का संज्ञान लेकर मुख्यमंत्री आबादी पट्टे में उल्लेखित अधिकारों को व्यवहार में लागू कराने हेतु आवश्यक पहल करें। साथ ही प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से भी अपेक्षा है कि वे पूरे छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री आबादी पट्टाधारकों के राजस्व अधिकारों के संबंध में स्पष्ट नीति और दिशा-निर्देश जारी करें, ताकि सभी जिलों में एक समान व्यवस्था लागू हो सके।
*🔶 अब निर्णय का समय, केवल आश्वासन का नहीं*
मुख्यमंत्री आबादी पट्टा केवल एक प्रमाण-पत्र नहीं, बल्कि शासन द्वारा प्रदत्त अधिकारों का आधिकारिक दस्तावेज है। यदि उसमें अंकित स्वामित्व, क्रय-विक्रय, हस्तांतरण और सीमांकन जैसे अधिकार आज भी राजस्व अभिलेखों में पूर्ण रूप से परिलक्षित नहीं हो रहे हैं, तो यह केवल पट्टाधारकों की समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का विषय भी है। अब समय आ गया है कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, विधानसभा अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह तथा प्रदेश के सभी जिलाधीश इस विषय पर स्पष्ट प्रशासनिक निर्देश जारी करें और पूरे प्रदेश में विशेष अभियान चलाकर मुख्यमंत्री आबादी पट्टाधारकों के नाम से पृथक बी-1, खसरा, एवं नक्शा तैयार कराएं। प्रदेशभर के हजारों पट्टाधारकों की निगाहें अब शासन और राजस्व प्रशासन के ठोस निर्णय पर टिकी हैं।

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