
(अकील मेमन)
राजनांदगांव/छुरिया।
भूमि की खरीदी-बिक्री किसी भी व्यक्ति के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक लेन-देन माना जाता है। एक आम नागरिक वर्षों की मेहनत की कमाई से जमीन या मकान खरीदता है और उम्मीद करता है कि शासन द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उसका पंजीयन (रजिस्ट्री) निष्पक्ष, पारदर्शी और सरल तरीके से हो जाएगा। लेकिन यदि पंजीयन कार्यालय ही आम जनता के लिए आर्थिक शोषण का केंद्र बन जाए, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि जनता के विश्वास पर गंभीर आघात है।
राजनांदगांव जिले के छुरिया तहसील पंजीयन कार्यालय को लेकर लगातार ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि यहां रजिस्ट्री कराने आने वाले लोगों को दस्तावेज़ लेखकों (अर्ज़ीनवीसों) के माध्यम से अनावश्यक रूप से परेशान किया जाता है। आरोप हैं कि दस्तावेजों में बार-बार छोटी-छोटी कमियां निकालकर उन्हें सुधारने के नाम पर मनमानी राशि वसूली जाती है। इससे आम नागरिकों में गहरा असंतोष व्याप्त है।
क्या रजिस्ट्री कार्यालय के बाहर समानांतर व्यवस्था चल रही है?
कार्यालय के सामने बड़ी संख्या में दस्तावेज़ लेखक वर्षों से बैठे दिखाई देते हैं। सामान्य नागरिक को यह समझ ही नहीं आता कि वह सीधे कार्यालय में जाकर अपना कार्य करा सकता है या नहीं। अधिकांश लोगों को पहले इन्हीं दस्तावेज़ लेखकों के पास भेज दिया जाता है।
यदि कोई व्यक्ति स्वयं दस्तावेज तैयार कराकर या कम खर्च में कार्य कराना चाहता है, तो आरोप है कि उसके दस्तावेजों में कभी नाम की त्रुटि, कभी नक्शे की कमी, कभी प्रारूप, कभी किसी अन्य तकनीकी कारण का हवाला देकर बार-बार लौटाया जाता है। बाद में वही दस्तावेज़ कुछ अतिरिक्त भुगतान के बाद आसानी से स्वीकार हो जाते हैं। यदि ऐसा हो रहा है, तो यह व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
गरीब और ग्रामीण सबसे अधिक प्रभावित
ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले किसान, मजदूर, बुजुर्ग और अशिक्षित नागरिक नियमों की पूरी जानकारी नहीं रखते। वे सरकारी कार्यालय में बैठे अधिकारियों पर भरोसा करके आते हैं, लेकिन यदि उन्हें हर चरण पर अलग-अलग भुगतान करने के लिए विवश होना पड़े, तो उनकी आर्थिक और मानसिक परेशानी बढ़ना स्वाभाविक है।
कई लोगों को अपनी रजिस्ट्री पूरी कराने के लिए कई बार कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं। आने-जाने का खर्च अलग, काम का नुकसान अलग और ऊपर से अतिरिक्त भुगतान का दबाव अलग।
यदि शुल्क निर्धारित है तो अतिरिक्त राशि क्यों?
शासन ने स्टाम्प शुल्क, पंजीयन शुल्क तथा अन्य देय राशि स्पष्ट रूप से निर्धारित कर रखी है। यदि दस्तावेज लेखन का भी कोई निर्धारित शुल्क है, तो उसकी सार्वजनिक जानकारी कार्यालय में स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होनी चाहिए।
यदि कहीं भी निर्धारित शुल्क से अधिक राशि ली जा रही है, तो इसकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी नागरिक से नियमों के विपरीत धन की मांग न हो।
प्रशासनिक निगरानी पर उठते सवाल
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि लंबे समय से ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं, तो क्या संबंधित विभाग द्वारा कभी व्यापक निरीक्षण किया गया? क्या किसी अधिकारी ने आम नागरिकों से गोपनीय रूप से जानकारी लेने का प्रयास किया? क्या किसी प्रकार का औचक निरीक्षण हुआ?
यदि नहीं, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
जनता पूछ रही है—क्या बिना अर्ज़ीनवीस के रजिस्ट्री संभव है?
आज भी बड़ी संख्या में लोगों की धारणा है कि यदि दस्तावेज़ लेखक के माध्यम से काम नहीं कराया गया, तो रजिस्ट्री होना कठिन है। यदि यह केवल धारणा है, तो प्रशासन को इसे दूर करना चाहिए। यदि वास्तविकता में ऐसी स्थिति है, तो उसे तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए।
सरकारी कार्यालय किसी भी नागरिक के लिए समान रूप से उपलब्ध होना चाहिए। किसी व्यक्ति को किसी विशेष माध्यम से जाने के लिए विवश महसूस नहीं होना चाहिए।
पारदर्शिता की आवश्यकता
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पंजीयन कार्यालयों में निम्न व्यवस्थाएं प्रभावी रूप से लागू कर दी जाएं, तो अधिकांश शिकायतें स्वतः समाप्त हो सकती हैं—
* सभी शुल्कों की सूची प्रमुख स्थान पर प्रदर्शित हो।
* दस्तावेज़ों की चेकलिस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो।
* हेल्प डेस्क स्थापित हो।
* शिकायत दर्ज कराने की सरल व्यवस्था हो।
* सीसीटीवी निगरानी प्रभावी हो।
* समय-समय पर औचक निरीक्षण किए जाएं।
* प्रत्येक नागरिक को रसीद सहित भुगतान की जानकारी दी जाए।
जांच से ही सामने आएगी सच्चाई
यह समाचार किसी व्यक्ति विशेष पर दोषारोपण करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि जनहित में उठ रहे गंभीर प्रश्नों को सामने रखने के लिए प्रकाशित किया जा रहा है। यदि शिकायतें निराधार हैं, तो निष्पक्ष जांच से यह स्पष्ट हो जाएगा। यदि शिकायतें सही पाई जाती हैं, तो दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई जनता का विश्वास पुनः स्थापित करेगी।
कलेक्टर से जनता की अपेक्षा
राजनांदगांव जिला प्रशासन से अपेक्षा की जा रही है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। आवश्यकता होने पर शिकायतकर्ताओं, दस्तावेज़ लेखकों, पंजीयन कार्यालय के कर्मचारियों तथा आम नागरिकों के बयान लेकर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाए।
यदि कहीं भी अवैध वसूली, दलाली, मिलीभगत या नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध विधिसम्मत कठोर कार्रवाई की जाए।
जनहित सर्वोपरि
सरकारी कार्यालय जनता की सुविधा के लिए बनाए गए हैं, न कि आम नागरिकों को भय, भ्रम या अतिरिक्त आर्थिक बोझ में डालने के लिए। यदि किसी भी स्तर पर व्यवस्था का दुरुपयोग हो रहा है, तो उसका सुधार प्रशासन की जिम्मेदारी है।




