
राजनांदगांव/छुरिया।
खुज्जी विधानसभा की राजनीति ने एक बार फिर ऐसा करवट बदला है कि जिले से लेकर राजधानी तक राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। कांग्रेस की संगठनात्मक बैठक में जो कुछ हुआ, उसकी चर्चा अब बंद कमरों से निकलकर चौराहों तक पहुंच चुकी है।
छुरिया के साहू धर्मशाला में बुलाई गई जिला ग्रामीण कांग्रेस की बैठक संगठन की मजबूती पर मंथन के लिए थी, लेकिन देखते ही देखते यह बैठक सियासी अखाड़े में तब्दील हो गई। सूत्रों के अनुसार ब्लाक कांग्रेंस अध्यक्ष समर्थक और वर्तमान विधायक समर्थक नेताओं के बीच ऐसी तीखी बहस हुई कि बैठक का मूल उद्देश्य ही पीछे छूट गया।
एक मंच पर दो कांग्रेस!
बैठक में मौजूद नेताओं के बीच आरोपों की झड़ी लग गई। किसी ने संगठन की उपेक्षा का मुद्दा उठाया तो किसी ने व्यक्तिगत राजनीति और वर्चस्व की लड़ाई का आरोप लगाया। हालात ऐसे बन गए कि कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा शुरू हो गई कि खुज्जी कांग्रेस आखिर एक है भी या दो हिस्सों में बंट चुकी है।
ब्लॉक अध्यक्ष बना ‘बारूद का ढेर’
नवनियुक्त ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर भी विवाद खुलकर सामने आया। विधायक समर्थक नेताओं ने सवाल उठाए तो दूसरी ओर ब्लॉक अध्यक्ष समर्थकों ने पलटवार कर दिया। आरोप-प्रत्यारोप के इस दौर ने बैठक का तापमान और बढ़ा दिया।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह विवाद केवल एक पद का नहीं, बल्कि संगठन में प्रभाव और पकड़ की लड़ाई का संकेत माना जा रहा है।
नेता गरजे, नेतृत्व खामोश!
सबसे ज्यादा चर्चा जिस बात की हो रही है, वह है नेतृत्व की भूमिका। सूत्र बताते हैं कि विवाद बढ़ता रहा, लेकिन माहौल शांत कराने के लिए कोई ठोस हस्तक्षेप सामने नहीं आया। यही वजह है कि अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर संगठन की कमान किसके हाथ में है और फैसले कौन ले रहा है।
भाजपा की लगी लॉटरी?
कांग्रेस की इस खुली कलह ने भाजपा को एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा दे दिया है। क्षेत्र में चर्चा है कि विपक्ष अब कांग्रेस की गुटबाजी को जनता के बीच जोर-शोर से उठाने की तैयारी में है।
खुज्जी कांग्रेस का ‘सुपर सवाल’
क्या ब्लाक संगठन खेमे की पकड़ ज्यादा मजबूत है?
क्या वर्तमान विधायक अपने ही संगठन में चुनौती झेल रहे हैं?
क्या जिला नेतृत्व इस सियासी आग को बुझा पाएगा?
या फिर आने वाले दिनों में यह टकराव और बड़ा विस्फोट करेगा?
फिलहाल छुरिया की बैठक ने इतना तो साफ कर दिया है कि खुज्जी कांग्रेस के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। अब राजनीतिक गलियारों में केवल एक ही चर्चा है—यह अंदरूनी जंग आखिर किस मोड़ पर जाकर रुकेगी?




