मिडिल ईस्ट में लंबे समय से जारी तनाव ने दुनिया को एक गंभीर ऊर्जा संकट के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है. कच्चे तेल और गैस के उत्पादन में भारी गिरावट आने और होर्मुज जैसा महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग बाधित होने की वजह से तेल और गैस के रेट बढ़ गए हैं. इस संकट ने कुछ देशों की किस्मत चमका दी है और उन्होंने आपदा को बड़े अवसर में बदल लिया है और मोटी कमाई कर रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ कई पारंपरिक तेल निर्यातक देशों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.
इस पूरे ऊर्जा संकट का सबसे बड़ा फायदा अमेरिका को हुआ है. वैश्विक बाजार में कच्चे तेल और ईंधन की कमी का फायदा उठाते हुए अमेरिकी कंपनियों ने जमकर मुनाफा कमाया है. अमेरिकी तेल कंपनियों ने इस दौरान करीब 14.50 करोड़ बैरल अतिरिक्त तेल की बिक्री की, जिससे देश को ₹4.81 लाख करोड़ की बंपर अतिरिक्त आय हुई है. अमेरिका लगातार बड़े पैमाने पर कच्चे तेल, डीजल और अन्य ईंधन का निर्यात बढ़ा रहा है.
द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस संकट काल में रूस को भी बड़ा आर्थिक लाभ हुआ है. युद्ध और प्रतिबंधों के कारण रूस के कुल तेल निर्यात में 5.92 लाख बैरल की गिरावट जरूर आई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने उसकी चांदी कर दी. युद्ध शुरू होने से पहले जिस रूसी तेल की कीमत महज $41 प्रति बैरल थी, वह $120 प्रति बैरल तक पहुंच गई. इस भारी मूल्य वृद्धि के कारण रूस ने तेल की मात्रा कम बेचने के बावजूद ₹1.44 लाख करोड़ का अतिरिक्त मुनाफा बटोरा है.
सऊदी अरब भी तेल के खेल में फायदे में है. होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर पूरी तरह निर्भर न होने और वैकल्पिक पाइपलाइनों के जरिए दूसरे बंदरगाहों से तेल भेजने की क्षमता के कारण सऊदी अरब नुकसान से बचा हुआ है. हालांकि उसका तेल निर्यात करीब 15.20 करोड़ बैरल कम रहा, लेकिन महंगे तेल के कारण सऊदी अरब की आय में ₹88,538 करोड़ से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
इन 5 खाड़ी देशों को लगा तगड़ा झटका
एक तरफ जहां अमेरिका, रूस और सऊदी अरब मुनाफे की रेस में आगे निकल गए, वहीं ईरान से जुड़े संघर्ष और भौगोलिक बाधाओं के कारण 5 प्रमुख खाड़ी देशों को भारी वित्तीय नुकसान झेलना पड़ा है. इन देशों का तेल उत्पादन और निर्यात दोनों ही बुरी तरह प्रभावित हुए हैं-




