देश

जल्द न खुला होर्मुज का ‘ताला’ तो फंस जाएंगे भारत-चीन, समुद्र में तैरता कच्चे तेल का ‘बैकअप’ हो रहा है तेजी से खत्म

अमेरिका-ईरान युद्ध ने पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट खड़ा कर दिया है. पश्चिम-एशिया में अब मिसाइल तो नहीं फूट रही लेकिन तनाव बरकरार है. कच्‍चे तेल परिवहन का अहम रास्‍ता होर्मुज बंद है. अब तक भारत और चीन कच्‍चे तेल की अपनी मांग को ‘जुगाड़’ और वैकल्पिक रास्तों के भरोसे पूरा कर रहे थे. लेकिन, अब ये रास्‍ता भी बंद होने की कगार पर है. युद्ध की शुरुआत में जब होर्मुज के रास्ते बंद होने लगे, तो भारत और चीन ने समुद्र में जहाजों पर मौजूद रूसी और ईरानी तेल कार्गो का इस्‍तेमाल करना शुरू किया. यह वह तेल था जो ट्रांजिट में था या पहले से ही समुद्र में था.
ब्‍लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, ऑयल ब्रोकरेज लिमिटेड के शिपिंग रिसर्च प्रमुख अनूप सिंह के अनुसार, फरवरी के मध्य में लगभग 2 करोड़ बैरल रूसी कच्चा तेल समुद्र में ‘स्टोरेज’ में उपलब्ध था. आज स्थिति यह है कि यह भंडार घटकर मात्र 50 लाख बैरल से भी कम रह गया है. कुछ डेटा इंटेलिजेंस फर्में तो इसे महज 30 लाख बैरल ही बता रही हैं. यानी जो बैकअप हफ्तों तक चल सकता था, वह अब कुछ ही दिनों का मेहमान है.
होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाला ट्रैफिक अब लगभग ठप हो चुका है. स्थिति इतनी गंभीर है कि चीन के निजी रिफाइनिंग सेक्टर जिन्हें ‘टीपॉट’ कहा जाता है को सेवा देने वाले वो जहाज भी अब पीछे हट रहे हैं जिन्हें पहले ‘ब्लैकलिस्टेड’ होने का डर नहीं था. अमेरिकी नौसेना की सख्त नाकेबंदी ने वैश्विक शिपिंग लाइनों में दहशत पैदा कर दी है. अब कोई भी जहाज इस जलमार्ग को चुनौती देने का साहस नहीं जुटा पा रहा है.
जेपी मॉर्गन चेज़ एंड कंपनी के अनुसार, यदि अमेरिकी नौसेना की वास्तविक नाकेबंदी लागू होती है, तो ईरान को उत्पादन घटाना पड़ सकता है. विश्लेषकों का कहना है कि ऐसा कदम तेल की उपलब्ध मात्रा को केवल वित्तीय रूप से ही नहीं बल्कि भौतिक रूप से भी सीमित कर देगा, जिससे वैकल्पिक व्यापार के लिए बहुत कम गुंजाइश बचेगी.
वॉर्टेक्सा के वरिष्ठ बाजार विश्लेषक जेवियर टैंग का कहना है कि अमेरिकी नाकेबंदी के चलते ट्रांजिट में ईरानी तेल की मात्रा में गिरावट आएगी, हालांकि यह बहुत तेज़ गति से नहीं होगी. वॉर्टेक्सा के अनुसार, फिलहाल ईरान के पास समुद्र में लगभग 16 करोड़ बैरल तेल मौजूद है, जो फरवरी के मुकाबले थोड़ा कम है. रूसी तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने ईरानी तेल को भी महंगा कर दिया है. पहले जो भारी छूट मिलती थी, वह अब प्रीमियम में बदल गई है, क्योंकि खरीदार मध्य पूर्व से आपूर्ति में कमी की भरपाई के लिए तेजी से विकल्प तलाश रहे हैं.

Leave A Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Posts