दुर्ग। जिला अस्पताल में सिकल सेल बीमारी से पीड़ित एक युवती की मौत के मामले में प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई की है। जांच के बाद सिविल सर्जन समेत आठ स्वास्थ्य कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। आरोप है कि जरूरत के समय मरीज को रक्त उपलब्ध नहीं कराया गया, जबकि ब्लड बैंक में पर्याप्त मात्रा में खून मौजूद था।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि जिस समय दीपिका को ओ पॉजिटिव रक्त की आवश्यकता थी, उस दौरान अस्पताल के ब्लड बैंक में इसी ग्रुप की 85 यूनिट रक्त उपलब्ध था। इसके बावजूद डोनर नहीं मिलने का हवाला देकर मरीज को समय पर खून नहीं दिया जा सका, जिसके बाद उसकी मौत हो गई।
प्रशासन की इस कार्रवाई पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि ब्लड बैंक के प्रभारी डॉ. जे.पी. मेश्राम और संबंधित विभागाध्यक्ष डॉ. देवेंद्र कुमार साहू को नोटिस के दायरे से बाहर रखा गया है, जबकि ब्लड बैंक संचालन और रक्त उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सीधे तौर पर इन्हीं अधिकारियों पर थी। ऐसे में कार्रवाई की निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।
बताया जा रहा है कि 1 जून को दीपिका के परिजन रक्त की व्यवस्था के लिए अस्पताल में लगातार प्रयास कर रहे थे। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने नियमों का हवाला देते हुए डोनर लाने पर जोर दिया, जबकि मरीज की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। इसी दौरान समय पर रक्त नहीं मिलने से उसकी जान चली गई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर अभिजीत सिंह द्वारा गठित दो सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति ने पूरे प्रकरण की जांच की। जांच रिपोर्ट में अस्पताल प्रबंधन की ओर से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से गंभीर लापरवाही सामने आने के बाद आठ स्वास्थ्य कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।
इस संबंध में सिविल सर्जन डॉ. आशीषन मिंज ने कहा, “सभी से 48 घंटे के भीतर जवाब मांगा गया है।”
इस घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली, आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं और जवाबदेही को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। अब सभी की नजर इस बात पर है कि मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कदम उठाए जाते हैं।





