ईरान ने होर्मुज के समुद्री रास्ते पर ऐसी ‘मौत’ बिछा रखी है कि सुपरपावर अमेरिका भी वहां जाने से कतरा रहा है. ट्रंप अपनी पूरी कोशिशों के बाद भी इस इलाके पर कब्जा नहीं कर पा रहे हैं. इसी बीच, US के एक दिग्गज नेता न्यूट गिंगरिच ने एक ऐसी खौफनाक प्लानिंग की याद दिलाई है जो कभी पनामा और कोलंबिया के लिए बनाई गई थी. गिंगरिच का सुझाव है कि पहाड़ों को काटकर तेल ट्रेड के लिए 21-24 मील के होर्मुज के कहीं बेहतर रास्ता बनाया जा सकता है. इसके बाद ईरान की कभी जरूरत नहीं पडेगी और अगर ऐसा हो गया तो शिया देश को हमेशा के लिए पछताना पड़ सकता है.
क्या है US नेता का रेडिकल ‘न्यू होर्मुज’ आइडिया?
अमेरिका के मशहूर नेता न्यूट गिंगरिच ने एक ऐसा आइडिया शेयर किया है, जिसने सबको हैरान कर दिया. उन्होंने सुझाव दिया कि ईरान के पास मौजूद ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को भूल जाना चाहिए और उसके बदले में कुछ दूर पर ही परमाणु बमों का इस्तेमाल करके एक नई नहर खोदी जानी चाहिए.
अब सवाल उठता है कि अगर यह प्रोजेक्ट हकीकत बनता है तो ये रास्ता नक्शे पर कहां और होर्मुज से कितनी दूरी पर हो सकता है.
अगर ये नहर संयुक्त अरब अमीरात के फुजैराह इलाके से निकाली जाती है, तो यह ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज‘ के सबसे संकरे और खतरनाक पॉइंट से लगभग 150 से 250 किलोमीटर दूर होगी. होर्मुज की चौड़ाई महज 21 मील है, जहां जहाज ईरान की सीमा के बेहद करीब होते हैं. नई नहर बनने से जहाज सीधे ओमान की खाड़ी में खुलेंगे, जिससे वो ईरान जमीन से कम से कम 200 किलोमीटर की सुरक्षित दूरी बनाए रख सकेंगे.
सिर्फ यही नहीं ये रास्ता समुद्री दूरी को लगभग 100 से 150 किलोमीटर तक कम भी कर सकता है, क्योंकि जहाजों को खाड़ी के भीतर तक चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा.
1960 के दशक में अमेरिका ने सचमुच ऐसे प्रोजेक्ट्स पर करोड़ों डॉलर खर्च किए थे. उस समय वैज्ञानिकों का मानना था कि परमाणु ताकत से हम धरती का नक्शा बदल सकते हैं और नई नहरें बना सकते हैं.
गिंगरिच उस दौर के नेता हैं जब अमेरिकी सरकार सच में परमाणु बमों से पहाड़ काटने और नहरें बनाने की सोच रही थी. आज जब भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है तो समुद्री रास्तों की सुरक्षा हमारे लिए भी बहुत जरूरी हो गई है लेकिन क्या परमाणु बम इसका सही समाधान हो सकते हैं?
अमेरिका पहले ही कर चुका है परमाणु बमों से नहर बनाने की प्लानिंग
1950 के दशक में ‘एटम्स फॉर पीस’ नाम का एक प्रोग्राम शुरू हुआ. इसके पीछे एडवर्ड टेलर जैसे वैज्ञानिकों का हाथ था, जिन्हें ‘हाइड्रोजन बम का पिता’ कहा जाता है. इस मिशन का मकसद परमाणु विस्फोटों का इस्तेमाल कंस्ट्रक्शन के कामों में करना था.वै ज्ञानिकों का मानना था कि इंसानी मशीनों से खुदाई करने में सालों लगेंगे, जबकि परमाणु बम कुछ ही पलों में यह काम कर देंगे.
प्रोजेक्ट चेरियट: अलास्का में एक बंदरगाह बनाने के लिए पांच परमाणु बम फोड़ने की योजना बनाई गई थी.
पनामा और कोलंबिया में परमाणु नहर : 60 के दशक में पनामा नहर छोटी पड़ने लगी थी. उस दौर में अमेरिकी सरकार ने परमाणु धमाकों से एक नई और गहरी नहर बनानेकी प्लानिंग तैयार की थी. इस प्रोजेक्ट के लिए 294 परमाणु बमों के इस्तेमाल का प्रस्ताव था, जिनकी कुल ताकत 16.6 करोड़ टन TNT के बराबर थी.
आंकड़ों के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट के लिए करीब 30,000 लोगों को उनके घरों से हटाना पड़ता. इनमें से लगभग 50% लोग आदिवासी समुदाय के थे. उस समय इस रिसर्च पर 1.75 करोड़ डॉलर खर्च किए गए थे, जो आज के समय में लगभग 18.5 करोड़ डॉलर यानी करीब 1,500 करोड़ रुपए के बराबर हैं.
क्यों रुक गया ये खतरनाक काम?
भले ही कागज पर ये विचार बहुत क्रांतिकारी लगता था लेकिन असलियत में इसके खतरे बहुत ज्यादा थे. परमाणु धमाकों के बाद निकलने वाला कचरा यानी रेडियोएक्टिव फॉलआउट इंसानों और प्रकृति के लिए जानलेवा साबित हो सकता था.
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि अगर दो अलग-अलग समंदर इस तरह जुड़ गए, तो एक तरफ के जीव दूसरी तरफ जाकर वहां के पर्यावरण को बर्बाद कर देंगे. 1963 की परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि ने ऐसे धमाकों पर रोक लगा दी थी.




