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ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित स्व. विनोद कुमार शुक्ल

दर्द

कोई दौर ऐसा आ जाए,
दर्द ही दर्द में समा जाए।

टूटने से पहले फिर विश्वास,
दृढ़ता में यूँ ही बदल जाए।

जीवन के कलह क्लेश,
का दौर यूँ ही बिखर जाए।

कितने दौर की असफलता,
सफलता में यूँ ही बदल जाए।

गजेंद्र बख्शी

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